रविवार, 7 फ़रवरी 2010

कतरनें: बुर्का बैन और बवाल

शब्दों के चयन के आधार पर आपका लेखन संतुलित है लेकिन विषय की जानकारी एकपक्षीय है जिससे विचारों में पूर्वाग्रह का आभास होता है.....मैं अपनी बात स्पष्ट करती हूँ ...सर अगर आप ये सोचते हैं कि मुस्लिम महिलाओं के शिक्षित न होने के लिए बुर्क़ा एक प्रमुख कारण है तो अफ़सोस कि आप ग़लत सोचते हैं क्यूंकि बुर्क़ा या पर्दाह नही बल्कि परिवार की आर्थिक स्थिति ये तय करती है कि बेटियां पढ़ाई करें या न करें. शायद आपको नही मालूम कि भारत में लगभग 80% मुस्लिम BPL के आस पास आते हैं.और ग़रीब माँ-बाप के लिए अपने बच्चों कि ज़रूरतों को पूरा करना ही दुश्वार होता है, ऐसे में स्कूल भेजना तो नामुमकिन सी बात होती है.....और रही बात बुर्क़े कि तो बुर्क़ा तब बुरा है जब वो आपकी सोच और नज़रिए पर पर्दाह डालता है...मैंने भी बुर्क़ा किया है और आपकी सोच के बिल्कुल खिलाफ मैं बुर्क़े में खुद को ज़्यादा एक्टिव, फ्री और Comfortable फील करती हूँ .. मेरे लिहाज से इसके कई फ़ायदे हैं जैसे कहीं बाहर जाना हो तो महज़ 5-7 मिनट में मैं खुद को तैयार कर लेती हूँ जो आम लड़कियों की timing से बिलकुल ही कम है...यानि मेरे वक़्त की बचत...invisible होने के कारण मेरा जनसंपर्क मेरी मर्ज़ी से होता है....और तो और आम लड़कियों से अलग, मैं पब्लिक प्लेस में अपने पहनावे को लेकर बिल्कुल बेपरवाह होती हूँ और सिर्फ अपने लक्ष्य पर ही फोकस रहती हूँ... साथ ही मुझे ख़याल नही आता कि बुर्क़े के साथ मैंने कभी किसी Teasing या Comment का सामना किया हो...तो सर व्यावहारिक रूप से तो बुर्क़ा मेरे लिए बेहतर था ....और अब आपके लेखन पर आती हूँ जो मेरे लिहाज़ से पूर्वाग्रह से ग्रसित है....आवेशजी ऐसा है कि अख़बार कि कतरनों से हम दुनियावी सोच और नज़रिए को तय नही कर सकते ..दरअसल आज कि दुनिया में हम इंसानों के तौर-तरीक़े, हमारे financial condition से तय होते हैं मज़हब से नही...शाहरुख़ खान साहेब की इज्ज़त बड़ी महँगी है इसीलिए उन्हें नेशनल लेवल पर बुरा लगा है, लेकिन आप किसी रिक्शा वाले शाहरुख़ खान को सरेआम थप्पड़ भी मर देंगे तो उस ग़रीब की इज्ज़त कहीं ज़ाया नही होगी,.... am i right sir ? फिर से पॉइंट पर आती हूँ, मेरे ख़याल से बुर्क़ा महज़ एक कपड़ा है जिसे किसी ख़ास मज़हब की लड़कियां पब्लिक प्लेस या अनजानी जगहों में जाते हुए पहनती हैं...ये बिल्कुल उसी तरह है जैसे की कुछ लड़कियां आधे अधूरे कपड़ों में घर से बाहर निकलना पसंद करती हैं और तब हम उन पर नैतिकता के आधार पर कोई रोक नही लगा सकते तो इन पर धार्मिकता के आधार पर रोक क्यों लगा रहे हैं ? .... मैं कह सकती हूँ की बुर्क़ा एक पहनावा मात्र है और उसकी धार्मिकता सिर्फ इतनी है की उसे किसी ख़ास कौम से जुड़े लोग ही पहनते हैं
दूसरी बात ये की बुर्क़े के कारण Ileteracy नही है बल्कि ग़रीबी की वजह से है........अगर मुस्लिम औरतों की ग़रीबी दूर कर दी जाए तो वो खुद बखुद पढ़ लेंगी......अंत में आपको बुर्क़े में क्या negativity नज़र आती है बताइयेगा, plz practical approach दीजियेगा ...काल्पनिक बातें नही ......anyway आपसे इतना ही कहना चाहूंगी की "नज़रिया बदल लेने से नज़ारे बदल जाते हैं".....एक और बात की अगर हमें ये लगता है कि बुर्क़ा कमजोरी कि निशानी है तो हमें इन कमज़ोर लोगों को उनकी कमजोरियों के साथ स्वीकार करना चाहिए ताकि एक वक़्त के बाद जब वो मज़बूत हो जायेंगे तो खुद ही ये तय कर लेंगे कि उनकी बेहतरी किस में है....इति सिद्धम .